आज अगर हम इस दौड़-भाग की जिंदगी से कुछ पल अपने लिए निकाल कर सोचने बैठें, तो हम सोचने को मजबूर होंगे कि हम कर क्या रहे हैं? हम जा कहां रहे हैं ? हमारे नैतिक मूल्यों का इतना ह्रास क्यों हो रहा है ? आदि आदि। तमाम इस तरह की बातें जो आज महानगरीय संस्कृति में आदमी को मानव मूल्यों से दूर ले कर जा रही हैं, हमारे मन में उठेंगी। क्या आपने कभी इस पर विचार किया ?
अगर किया है तो दोस्त कुछ लिख भेजो मेरी पोस्ट पर। मैं आपके विचार सुनने को आतुर बैठा हूं।
नरेंद्र
Wednesday, September 2, 2009
Thursday, March 12, 2009
लोकसभा चुनाव
लोक सभा चुनाव घोषित हो चुके हैं। एक बार फिर तथाकथित नेता जनता के द्वार पर आएंगे। हालांकि नेताओं ने लोकलुभावन बातों का पिटारा खोलना शुरू कर दिया है, पर देखना यह है कि जनता जनार्दन किसको कितना भाव देती है। मैं आप साथियों से पूछना चाहता हूं कि ऐसा क्या किया जा सकता है कि हमारे देश में एक स्वस्थ लोकतंत्र कायम हो सके। एक ऐसा आदर्श लोकतंत्र जिसमें करप्शन न हो, जनता का राज वास्तव में जनता का ही हो।
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