Wednesday, September 2, 2009

सबकुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी

आज अगर हम इस दौड़-भाग की जिंदगी से कुछ पल अपने लिए निकाल कर सोचने बैठें, तो हम सोचने को मजबूर होंगे कि हम कर क्‍या रहे हैं? हम जा कहां रहे हैं ? हमारे नैतिक मूल्‍यों का इतना ह्रास क्‍यों हो रहा है ? आदि आदि। तमाम इस तरह की बातें जो आज महानगरीय संस्‍कृति में आदमी को मानव मूल्‍यों से दूर ले कर जा रही हैं, हमारे मन में उठेंगी। क्‍या आपने कभी इस पर विचार किया ?
अगर किया है तो दोस्‍त कुछ लिख भेजो मेरी पोस्‍ट पर। मैं आपके विचार सुनने को आतुर बैठा हूं।
नरेंद्र